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पन्ना चिता आंदोलन का 9वां दिन: मझगांय बांध के खिलाफ मिट्टी सत्याग्रह, टपरियों में डेरा और मशाल जुलूस से गूंजा अजयगढ़
Panna News: अजयगढ़ पन्ना से हमारे संवाददाता ने बताया कि पन्ना जिले के अजयगढ़ तहसील में चल रहा किसानों और आदिवासियों का आंदोलन अब पूरे मध्यप्रदेश में चर्चा का विषय बन गया है। मझगांय बांध से प्रभावित परिवारों द्वारा शुरू किया गया चिता आंदोलन अपने नौवें दिन और भी उग्र और संगठित हो गया है। शुक्रवार को आंदोलनकारियों ने एक नया प्रयोग किया है जिसे उन्होंने नाम दिया है - मिट्टी सत्याग्रह।
पिछले नौ दिनों से ये ग्रामीण अपनी ही चिता बनाकर उस पर बैठकर विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार ने जीते जी उन्हें बेघर कर दिया है, इसलिए वे अपनी चिता पर बैठकर अपनी आखिरी लड़ाई लड़ रहे हैं। अब इस लड़ाई में जल सत्याग्रह, मशाल जुलूस के बाद मिट्टी सत्याग्रह भी जुड़ गया है।
पूरा मामला क्या है? मझगांय बांध का इतिहास और विवाद
मझगांय बांध परियोजना पन्ना जिले की एक महत्वपूर्ण सिंचाई परियोजना है। इस परियोजना का उद्देश्य क्षेत्र के किसानों को सिंचाई के लिए पानी उपलब्ध कराना और पेयजल की समस्या को दूर करना बताया गया था। बांध का निर्माण कई साल पहले शुरू हुआ था, लेकिन इसके डूब क्षेत्र में आने वाले गांवों के पुनर्वास का मुद्दा शुरू से ही विवादों में रहा है।
पन्ना और अजयगढ़ के बीच स्थित इस बांध के कारण दर्जनों गांव पूरी तरह या आंशिक रूप से डूब की जद में आ रहे हैं। इसमें मुख्य रूप से आदिवासी बहुल गांव शामिल हैं। इन गांवों के लोगों का आरोप है कि जब जमीन अधिग्रहण किया गया था, तब उन्हें जो वादे किए गए थे, वे पूरे नहीं हुए।
किसानों का कहना है कि उनकी उपजाऊ जमीन का मूल्यांकन बहुत कम किया गया। कई परिवारों को उनकी जमीन के बदले बहुत कम मुआवजा दिया गया। सबसे बड़ी समस्या पुनर्वास को लेकर है। सरकार ने कहा था कि विस्थापित परिवारों को नई जगह पर जमीन, घर और सभी सुविधाएं दी जाएंगी, लेकिन हकीकत में ऐसा कुछ नहीं हुआ। कई परिवार आज भी अपने टूटे-फूटे घरों में रहने को मजबूर हैं, जबकि उनके खेतों में बांध का पानी भरने लगा है।
इसी गुस्से और निराशा ने चिता आंदोलन को जन्म दिया है। जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर के नेतृत्व में सैकड़ों किसान और आदिवासी पिछले नौ दिनों से अजयगढ़ के पास धरने पर बैठे हैं।
नौवें दिन क्या कुछ नया हुआ? आंदोलन के 3 बड़े बदलाव
नौवें दिन आंदोलन स्थल पर तीन बड़े बदलाव देखने को मिले, जिसने प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है।
1. टपरियों में डेरा और अनिश्चितकालीन धरने का ऐलान:
पहले आंदोलनकारी दिन में आते थे और शाम को घर चले जाते थे। लेकिन अब उन्होंने आंदोलन स्थल पर ही अस्थायी टपरियां बना ली हैं। बांस, बल्ली, तिरपाल और पन्नी से बनी इन टपरियों में ही अब उनका पूरा परिवार रह रहा है। महिलाओं ने वहीं चूल्हा-चौका शुरू कर दिया है, बच्चों के सोने की व्यवस्था कर ली है और राशन-पानी का इंतजाम कर लिया है। आंदोलनकारियों ने साफ कर दिया है कि जब तक उनकी मांगें पूरी नहीं होतीं, वे यहां से हिलने वाले नहीं हैं। यह अब एक दिन का धरना नहीं, अनिश्चितकालीन महापड़ाव बन गया है।
2. मिट्टी सत्याग्रह की शुरुआत: यह इस आंदोलन का सबसे भावुक पहलू है। शुक्रवार सुबह सभी आंदोलनकारी अपने-अपने खेतों से एक-एक मुट्ठी मिट्टी लेकर आए। महिलाओं, बुजुर्गों और युवाओं ने उस मिट्टी को हाथ में लेकर प्रदर्शन किया। उनका कहना था कि यह मिट्टी सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं है। यह हमारी मां है। इसी मिट्टी में हमारे पुरखों के पसीने की खुशबू है, इसी मिट्टी में हम खेले हैं, इसी मिट्टी ने हमें अनाज दिया है। सरकार हमें इसी मिट्टी से उजाड़ रही है। इसलिए हम इस मिट्टी को सीने से लगाकर सरकार को बता रहे हैं कि हम अपनी मां को नहीं छोड़ सकते। इस दौरान कई बुजुर्ग महिलाएं रो पड़ीं।
3. देर रात तक मशाल जुलूस: आंदोलन अब सिर्फ दिन तक सीमित नहीं है। शाम ढलते ही सैकड़ों ग्रामीण हाथों में मशाल लेकर जुलूस निकालते हैं। देर रात तक "जय जवान, जय किसान" और "हमें हमारा हक चाहिए" के नारे गूंजते रहते हैं। अंधेरे में जलती हुई सैकड़ों मशालें दूर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे पूरा गांव जाग रहा हो और अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा हो। यह मशाल जुलूस प्रशासन पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने का एक तरीका भी है।
अमित भटनागर का बड़ा आरोप: प्रशासन लोकतंत्र का चीरहरण कर रहा है
आंदोलन के प्रमुख नेता अमित भटनागर ने सरकार और जिला प्रशासन पर जमकर हमला बोला। उन्होंने कहा कि शासन-प्रशासन लोकतांत्रिक तरीके से अपनी आवाज उठा रहे किसानों की आवाज को दबाने की कोशिश कर रहा है।
भटनागर ने कहा, "एक तरफ हम शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रख रहे हैं, दूसरी तरफ प्रशासन लगातार हमें डराने-धमकाने की कोशिश कर रहा है। कभी नोटिस भेजा जाता है, कभी पुलिस गांव में आकर लोगों को धमकाती है। कभी कहा जाता है कि धारा 144 लगी है। यह लोकतंत्र का चीरहरण है। हम कोई अपराधी नहीं हैं, हम अपने हक के लिए लड़ रहे किसान हैं।"
उन्होंने आगे कहा, "शासन समझता है कि पुलिस के दम पर आंदोलन खत्म हो जाएगा। लेकिन पुलिस के दम पर हमारी मांगें खत्म नहीं होंगी। हमारी मांगें हैं - न्यायपूर्ण मुआवजा और सम्मानजनक पुनर्वास। अगर प्रशासन को लगता है कि मुझे गिरफ्तार करके, जेल में डालकर यह आंदोलन खत्म हो जाएगा, तो यह उनकी गलतफहमी है। मुझे जेल में डाल देंगे तो क्या गांवों का पानी रुक जाएगा? क्या लोगों का मुआवजा मिल जाएगा? क्या विस्थापन की समस्या खत्म हो जाएगी? मैं जेल में रहूंगा, लेकिन गांव का हर बच्चा, हर महिला इस आंदोलन का नेता बनेगा। आंदोलन जारी रहेगा।"
भटनागर ने स्पष्ट किया कि उनका आंदोलन किसी व्यक्ति विशेष या किसी अधिकारी के खिलाफ नहीं है। उनका आंदोलन सिस्टम के खिलाफ है, उस व्यवस्था के खिलाफ है जो आदिवासियों और किसानों को उजाड़कर विकास का ढोल पीटती है।
सबसे बड़ा मुद्दा: निर्माण से लेकर मुआवजे तक भ्रष्टाचार
इस आंदोलन का सबसे गंभीर पहलू भ्रष्टाचार के आरोप हैं। अमित भटनागर और ग्रामीणों का आरोप है कि मझगांय बांध परियोजना में शुरू से लेकर अंत तक भारी भ्रष्टाचार हुआ है।
उन्होंने सिलसिलेवार आरोप लगाए। पहला आरोप सर्वे को लेकर है। ग्रामीणों का कहना है कि जब जमीन का सर्वे हुआ था, तब कई किसानों की जमीन को जानबूझकर कम दर्ज किया गया, बंजर बताकर कम मुआवजा दिया गया। दूसरा आरोप निर्माण कार्य में गुणवत्ता को लेकर है। तीसरा और सबसे बड़ा आरोप मुआवजा वितरण में है। ग्रामीणों का कहना है कि मुआवजे की राशि में बड़े पैमाने पर हेरफेर हुई है। कई अपात्र लोगों को पैसा दे दिया गया और कई पात्र परिवारों को आज तक एक रुपया भी नहीं मिला।
भटनागर ने मांग की है कि इस पूरी परियोजना की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाए। उन्होंने कहा, "हम मांग करते हैं कि सरकार एक उच्च स्तरीय जांच समिति बनाए, जिसमें रिटायर्ड जज, किसान नेता और मीडिया के लोग शामिल हों। वह समिति गांव-गांव जाकर हर परिवार से मिले और सच्चाई का पता लगाए। दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा। हमारा आरोप है कि निर्माण से लेकर मुआवजे और पुनर्वास तक पूरी प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव है।"
उन्होंने एक बहुत ही मार्मिक बात कही जो इस पूरे आंदोलन का सार है। उन्होंने कहा, "जब गांव डूबने जा रहा है, तब यह बताना महत्वपूर्ण नहीं है कि किसी को कितना पैसा दिया गया। महत्वपूर्ण यह है कि उसका कितना अधिकार अभी बाकी है। जो दिया गया वह उसका हक था, कोई एहसान नहीं था। लेकिन जो बाकी रह गया, उसकी जिम्मेदारी प्रशासन की है। सरकार को यह बताना चाहिए कि कितने परिवारों को अभी तक घर नहीं मिला, कितने परिवारों को जमीन के बदले जमीन नहीं मिली।"
रमिया आदिवासी की मौत और प्रशासन की संवेदनहीनता
इस आंदोलन में रमिया आदिवासी नाम की एक महिला की मौत का मामला भी तूल पकड़ रहा है। बताया जा रहा है कि रमिया आदिवासी का परिवार भी विस्थापन से प्रभावित था और तनाव व बदहाली के कारण उसकी मौत हो गई।
प्रशासन ने इस पर सफाई देते हुए कहा था कि रमिया के परिवार को मुआवजे की राशि दे दी गई थी। लेकिन आंदोलनकारियों ने इस जवाब को असंवेदनशील बताया। भटनागर ने कहा, "एक आदिवासी महिला की मौत के बाद भी प्रशासन केवल यह बता रहा है कि कितनी राशि दी गई थी। यह क्यों नहीं बताया जा रहा कि परिवार को क्या-क्या मिलना बाकी था और पुनर्वास की स्थिति क्या थी? क्या उन्हें रहने के लिए घर मिला था? क्या उन्हें खेती के लिए दूसरी जमीन मिली थी? डूबते गांव के बीच परिवार की चिंता को भी गंभीरता से देखा जाना चाहिए। सिर्फ पैसा दे देना ही पुनर्वास नहीं होता। पुनर्वास का मतलब होता है सम्मानजनक जीवन।"
आंदोलनकारियों का कहना है कि रमिया बाई के मामले में उपलब्ध दस्तावेजों और परिवार के बयानों के आधार पर पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। यह मामला मानवाधिकार से जुड़ा है।
अनुमति के सवाल पर आंदोलनकारियों का जवाब
प्रशासन की तरफ से अक्सर यह कहा जाता है कि आंदोलनकारियों ने धरना-प्रदर्शन की अनुमति नहीं ली है। इस पर अमित भटनागर ने बहुत ही सधा हुआ जवाब दिया।
उन्होंने कहा, "हम किसी सार्वजनिक सड़क को बंद करके या आम लोगों को परेशान करके आंदोलन नहीं कर रहे हैं। हम नेशनल हाईवे जाम नहीं कर रहे, हम बाजार बंद नहीं करा रहे। प्रभावित ग्रामीण अपने ही गांव में, अपनी ही जमीन पर, अपनी समस्याओं को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से बैठे हैं। क्या अपने ही गांव में बैठने के लिए भी अनुमति लेनी पड़ेगी? हमारा कहना है कि गांव में ग्रामीणों द्वारा किए जा रहे शांतिपूर्ण सत्याग्रह को समझने के बजाय प्रशासन बार-बार दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। अगर प्रशासन को लगता है कि किसी विशेष गतिविधि के लिए अनुमति आवश्यक है, तो उसे स्पष्ट कानूनी आधार के साथ बताया जाना चाहिए, न कि केवल दबाव के माध्यम से आंदोलन समाप्त करने का प्रयास किया जाए।"
आगे क्या होगा? आंदोलन का भविष्य
नौ दिन बीत जाने के बाद अब यह साफ हो गया है कि यह आंदोलन जल्द खत्म होने वाला नहीं है। मिट्टी सत्याग्रह और टपरियों में डेरा डालने से यह और भी लंबा खिंच सकता है। ग्रामीणों का मनोबल टूटने के बजाय हर दिन मजबूत हो रहा है। आसपास के गांवों से भी अब समर्थन मिलने लगा है।
दूसरी तरफ प्रशासन पर भी अब दबाव बढ़ रहा है। लगातार नौ दिनों से चल रहा यह आंदोलन प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन बातचीत का रास्ता अपनाता है या दमन का।
फिलहाल के लिए पन्ना का यह चिता आंदोलन सिर्फ मुआवजे की लड़ाई नहीं रह गया है। यह अपनी मिट्टी, अपनी पहचान और अपने अस्तित्व को बचाने की लड़ाई बन गया है। और जैसा कि आंदोलनकारी कह रहे हैं, जब तक न्याय नहीं मिलेगा, तब तक यह चिता जलती रहेगी।
Disclaimer: यह रिपोर्ट मीडिया सेल, जय किसान संगठन से प्राप्त जानकारी और ग्रामीणों से बातचीत के आधार पर तैयार की गई है।
हमारी टीम का विशेष आभार
संवाददाता: अजयगढ़, पन्ना से राजकुमार प्रजापति की विशेष रिपोर्ट।
लेखक / संपादक: राजेश कुमार पटेल (पन्ना, मध्य प्रदेश)
प्रकाशक: आपका न्यूज़ स्टार (पन्ना, मध्य प्रदेश)

