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एक दौर विपक्ष और सरकार का: जब विरोधी दुश्मन नहीं होते थे।

Bharatiya Loktantra me Satta aur Vipaksh ke samman ka prateek`
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एक दौर विपक्ष और सरकार का: जब विरोधी दुश्मन नहीं होते थे।

भारतीय लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष के रिश्तों का इतिहास बहुत पुराना है। आज जब राजनीति में भाषा की मर्यादा टूटती दिखती है, तब इतिहास के कुछ पन्ने हमें याद दिलाते हैं कि वैचारिक विरोध के बावजूद सम्मान कैसे बना रहता था।

31 अक्टूबर 1984: जब विपक्ष रोया था

31 अक्टूबर 1984 की सुबह जब पूरी दुनिया इंदिरा गांधी की हत्या की खबर से दहल उठी, तब विपक्ष के शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी मॉस्को में थे। खबर मिलते ही वे बिना एक पल गंवाए दिल्ली के लिए रवाना हुए।

1 नवंबर 1984 को जब अटल जी 1, सफदरजंग रोड पहुँचे और इंदिरा जी के पार्थिव शरीर को देखा, तो उनकी आँखों से आँसू छलक पड़े। यह एक राजनीतिक विरोधी का रोना नहीं था, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस मर्यादा का रुदन था जिसने सत्ता और विपक्ष को कभी दुश्मन नहीं बनने दिया।

1957 से 1984 तक: सम्मान का 27 साल का इतिहास

1957 में जब 33 वर्ष के युवा अटल जी बलरामपुर से पहली बार लोकसभा पहुँचे, तब से लेकर 1984 तक का 27 वर्षों का इतिहास गवाही देता है कि वैचारिक मतभेदों के पहाड़ों के बावजूद दोनों नेताओं ने एक-दूसरे के प्रति जो सम्मान दिखाया, उसकी आज कल्पना भी मुश्किल है।

1971 का किस्सा: जब अटल ने इंदिरा को 'दुर्गा' कहा

1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध में जब 16 दिसंबर 1971 को 93,000 पाकिस्तानी सैनिकों ने आत्मसमर्पण किया, तब 17 दिसंबर 1971 को संसद में अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदिरा गांधी को 'अभिनव दुर्गा' कहकर संबोधित किया था। यह भारतीय संसदीय इतिहास का सबसे यादगार पल था।

इसी दौर का एक रोचक किस्सा है। इंदिरा गांधी अक्सर कहती थीं कि "अटल जी बहुत हाथ हिला-हिलाकर बोलते हैं।" इस पर अटल जी ने जवाब दिया, "क्या आपने कभी किसी को पैर हिलाकर बात करते देखा है?" इस पर इंदिरा जी खुद हंस पड़ी थीं।

आपातकाल और उसके बाद की उदारता

25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक 21 महीनों के आपातकाल में जब अटल जी जेल में थे, तब भी उनके स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखा गया।

1977 में जब जनता पार्टी की सरकार बनी और अटल जी विदेश मंत्री बने, तो उन्होंने देखा कि दफ्तर से इंदिरा जी की तस्वीर हटा दी गई है। उन्होंने तुरंत कहा, "यह देश की पूर्व प्रधानमंत्री हैं, इनका सम्मान राजनीति से ऊपर है। तस्वीर वापस लगाइए।"

1988 से 1994 तक: जब सरकार ने विपक्ष को देश का चेहरा बनाया

1988 में अटल जी की किडनी की समस्या फिर बढ़ी। तब प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने उन्हें संयुक्त राष्ट्र अधिवेशन के लिए प्रतिनिधिमंडल का नेता बनाकर न्यूयॉर्क भेजा, ताकि सरकारी खर्च पर उनका इलाज हो सके। बाद में अटल जी ने खुद कहा था, "आज अगर मैं जीवित हूँ, तो राजीव गांधी की वजह से हूँ।"

1994 में जिनेवा में जब पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ प्रस्ताव रखा, तब प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने किसी कांग्रेसी को नहीं, बल्कि विपक्ष के नेता अटल जी को भारतीय प्रतिनिधिमंडल का प्रमुख बनाकर भेजा। अटल जी के भाषण के बाद पाकिस्तान को प्रस्ताव वापस लेना पड़ा।

2004-2014: संवाद का दौर

2004 से 2014 के बीच जब डॉ. मनमोहन सिंह ने सिविल न्यूक्लियर डील (123 समझौता) किया, तो उन्होंने लालकृष्ण आडवाणी और भाजपा नेतृत्व के साथ दर्जनों बैठकें कर सहमति बनाने की कोशिश की थी।

2014 के बाद बदलाव: एक तुलनात्मक विश्लेषण

पिछले कुछ वर्षों में राजनीतिक भाषा में गिरावट देखी गई है।
वर्ष घटना टिप्पणी
2012 गुजरात चुनाव में कुछ विवादित शब्दों का प्रयोग विपक्ष द्वारा आपत्ति
2018 नोहर रैली में "कांग्रेस की विधवा" टिप्पणी संसद में हंगामा
2021 बंगाल चुनाव में "दीदी ओ दीदी" संबोधन चुनाव आयोग में शिकायत
2022 नेशनल हेराल्ड विरोध के दौरान हिरासत विपक्ष का आरोप
लोकतंत्र का असली अर्थ क्या है?

इतिहास गवाह है कि नेहरू, इंदिरा, राजीव, अटल और मनमोहन सिंह ने कभी विपक्ष के वजूद को मिटाने की कोशिश नहीं की। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है जब सत्ता सवाल सुनने का साहस रखे और विपक्ष सम्मान के साथ सवाल पूछे।

निष्कर्ष
आज के दौर में जब प्रचार पर हजारों करोड़ खर्च होते हैं, तब 1984 वाला वह दौर याद आता है जब एक विरोधी नेता की आँख में दूसरे नेता के लिए आँसू थे। यही भारतीय लोकतंत्र की असली खूबसूरती है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले सवाल


Q1. अटल जी ने इंदिरा जी को दुर्गा कब कहा था?
17 दिसंबर 1971 को संसद में 1971 युद्ध की जीत के बाद।

Q2. 1988 में अटल जी को UN में किसने भेजा था?
तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने।

Q3. 1994 में जिनेवा में भारत का पक्ष किसने रखा था?
विपक्ष के नेता अटल बिहारी वाजपेयी ने।

Disclaimer: यह लेख ऐतिहासिक तथ्यों और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध संसदीय रिकॉर्ड पर आधारित एक विश्लेषणात्मक लेख है। इसका उद्देश्य किसी दल का समर्थन या विरोध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर चर्चा है।

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