नाना पाटेकर - एक विद्रोही, एक अभिनेता, एक फरिश्ता - गरीबी से शोहरत तक की पूरी कहानी।
By - ब्यूरो रिपोर्ट, पन्ना | 8 अक्टूबर 2026 | Bollywood News
Bollywood News: भारतीय सिनेमा में कुछ अभिनेता ऐसे होते हैं जो सिर्फ अभिनय नहीं करते, बल्कि किरदार को जीते हैं। नाना पाटेकर उन्हीं में से एक हैं। उनकी आँखों में गुस्सा, आवाज में दम और दिल में समाज के लिए दर्द - यही उन्हें सबसे अलग बनाता है।
1. जन्म और गरीबी भरा बचपन (1951-1970)
नाना पाटेकर का जन्म 1 जनवरी 1951 को महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड-जंजिरा गाँव में एक मध्यमवर्गीय मराठी परिवार में हुआ था। उनका असली नाम विश्वनाथ दिनकर पाटेकर है। उनके पिता दिनकर पाटेकर एक छोटे व्यापारी थे जो कपड़े पर डिजाइन बनाकर बेचते थे। माँ संजनाबाई गृहिणी थीं।
नाना 5 भाई-बहनों में सबसे बड़े थे। परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी। नाना ने खुद कई इंटरव्यू में बताया है कि बचपन में उनके घर में कभी-कभी खाने के भी लाले पड़ जाते थे।
उनका बचपन बहुत संघर्षपूर्ण था। उन्हें बचपन से ही जिम्मेदारी का एहसास हो गया था। जब वे केवल 13 साल के थे, तब उन्होंने परिवार की मदद के लिए फिल्मों के पोस्टर पेंट करने शुरू कर दिए थे। वे एक-एक पोस्टर 35 रुपये में बनाते थे। यही से उनकी कला से पहली कमाई शुरू हुई।
वे कहते हैं, "मैंने गरीबी को बहुत करीब से देखा है, इसलिए मुझे पैसे का घमंड कभी नहीं हुआ।"
2. शिक्षा और थिएटर - अभिनय की पहली पाठशाला
नाना की शुरुआती पढ़ाई मुरुड में ही हुई। बाद में वे मुंबई आ गए। उन्होंने मुंबई के प्रसिद्ध सर जे.जे. इंस्टीट्यूट ऑफ एप्लाइड आर्ट से इंटीरियर डिजाइनिंग की पढ़ाई की।
कॉलेज के दिनों में ही उनका रुझान थिएटर की ओर हो गया। पढ़ाई के साथ-साथ वे मराठी नाटकों में काम करने लगे। 70 के दशक में उन्होंने कई मराठी नाटकों में काम किया। थिएटर ने ही उन्हें आवाज का उतार-चढ़ाव, संवाद अदायगी और किरदार में घुसने की कला सिखाई। लगभग 10-12 साल तक उन्होंने थिएटर में कड़ा संघर्ष किया। उस समय उन्हें 50 रुपये प्रति शो मिलते थे।
3. बॉलीवुड में पहला कदम - लंबा इंतजार
नाना पाटेकर ने 1978 में फिल्म 'गमन' से हिंदी सिनेमा में कदम रखा, लेकिन इस फिल्म में उन्हें बहुत छोटा सा रोल मिला। लोग उन्हें पहचानते भी नहीं थे। 1978 से 1986 तक लगभग 8 साल तक वे छोटे-मोटे रोल करते रहे। कई बार उन्हें फिल्मों से निकाल भी दिया जाता था।
असली पहचान उन्हें 1986 में आई फिल्म 'अंकुश' से मिली। इस फिल्म में उनके दमदार अभिनय को लोगों ने नोटिस किया। लेकिन असली धमाका तो 1988 में हुआ।
4. 'परिंदा' और राष्ट्रीय पुरस्कार - सितारा बनने की कहानी
1988 में विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म 'परिंदा' आई। इसमें नाना ने एक खूंखार गैंगस्टर 'अन्ना' का किरदार निभाया। उनका अभिनय इतना वास्तविक था कि लोग डर गए। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का पहला राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
इसके बाद तो जैसे सफलता की लाइन लग गई।
1989 - त्रिदेव और मोहिनी: इन फिल्मों से वे विलेन के तौर पर स्थापित हो गए।
1990 - थोडासा रूमानी हो जाएं: इस फिल्म के लिए उन्हें दूसरा राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
1991 - प्रहार: इस फिल्म को उन्होंने खुद निर्देशित भी किया था। यह भारतीय सेना के जीवन पर आधारित थी।
5. क्रांतिवीर - एक इतिहास
1994 में आई फिल्म 'क्रांतिवीर' ने नाना पाटेकर को सुपरस्टार बना दिया। मेहुल कुमार निर्देशित इस फिल्म में उनका पत्रकार प्रताप नारायण तिलक का किरदार आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है।
"आ गया मेरा वतन, आ गया..."
"ये तेजाब से जली हुई बेटी..."
जैसे डायलॉग्स ने पूरे देश को हिला दिया था। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय पुरस्कार और फिल्मफेयर अवॉर्ड दोनों मिले। यह फिल्म आज भी हर 15 अगस्त और 26 जनवरी को दिखाई जाती है।
6. नाना का सुनहरा दौर (1994-2005)
क्रांतिवीर के बाद नाना ने एक से बढ़कर एक फिल्में दीं:
तिरंगा (1992): इसमें उनका डायलॉग "मैं भारत का वो किसान हूँ..."
अग्निसाक्षी (1996): इस फिल्म के लिए उन्हें तीसरा राष्ट्रीय पुरस्कार मिला।
खामोशी (1996), गुलाम-ए-मुस्तफा, यशवंत (1997), सत्या (1998), वजूद (1998), कोहराम (1999)
शक्ति: द पावर (2002): इसमें उनके अभिनय की सभी ने तारीफ की।
उन्होंने हर तरह के रोल किए - विलेन, हीरो, पिता, पुलिस ऑफिसर।
7. कॉमेडी में नया अवतार - वेलकम
जिस अभिनेता को लोग गुस्सैल समझते थे, उसने 2007 में सबको हंसा-हंसा कर लोटपोट कर दिया। फिल्म 'वेलकम' में उदय शेट्टी के किरदार में नाना पाटेकर ने कॉमेडी का नया इतिहास रच दिया।
"औए, कंट्रोल उदय, कंट्रोल..."
यह डायलॉग आज भी मीम्स में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है। इसके बाद वेलकम बैक, हाउसफुल जैसी फिल्मों में भी उनकी कॉमेडी को खूब पसंद किया गया।
8. पर्सनल लाइफ
नाना पाटेकर की शादी नीलकांती पाटेकर से हुई थी, जो एक मराठी अभिनेत्री थीं। बाद में उनका तलाक हो गया। उनका एक बेटा है - मल्हार पाटेकर।
नाना अपनी पर्सनल लाइफ को हमेशा मीडिया से दूर रखते हैं। वे मुंबई के अंधेरी में एक साधारण 1 BHK फ्लैट में रहते हैं, जबकि वे करोड़ों की संपत्ति के मालिक हैं।
9. नाम फाउंडेशन - असली हीरो
नाना पाटेकर की असली पहचान समाज सेवा से है। 2015 में जब महाराष्ट्र में किसान आत्महत्या कर रहे थे, तब नाना ने अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर 'नाम फाउंडेशन' की शुरुआत की।
यह फाउंडेशन आज तक:
20,000 से ज्यादा विधवा किसानों की मदद कर चुका है।
गांवों में पानी के लिए नदियों को गहरा करने का काम किया है।
किसानों को बीज, खाद और आर्थिक मदद देता है।
उन्होंने अपनी फिल्मों की 90% कमाई इस फाउंडेशन में दान कर दी है। वे खुद गांव-गांव जाकर किसानों से मिलते हैं। वे आज भी अपने गांव में खेती करते हैं।
2013 में उत्तराखंड बाढ़ और 2014 में कश्मीर बाढ़ में भी उन्होंने गुप्त दान किया था।
10. पुरस्कार और सम्मान
3 बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार
2 बार फिल्मफेयर पुरस्कार
पद्मश्री (2013) - भारत सरकार द्वारा
निष्कर्ष
नाना पाटेकर सिर्फ एक अभिनेता नहीं, एक सोच हैं। उन्होंने सिखाया कि सफलता का मतलब बड़ी गाड़ी और बड़ा बंगला नहीं, बल्कि जमीन से जुड़े रहना है। आज के दिखावे के दौर में उनकी सादगी ही उनकी सबसे बड़ी अमीरी है।
उनकी कहानी हर उस युवा के लिए प्रेरणा है जो गरीबी से निकलकर कुछ बड़ा करना चाहता है।
जय हिंद!
हमारी टीम का विशेष आभार
लेखक / संपादक: राजेश कुमार पटेल (पन्ना, मध्य प्रदेश)
प्रकाशक: आपका न्यूज़ स्टार (पन्ना, मध्य प्रदेश)
